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अंग्रेजी, उपनिवेशवाद और वर्ग

Exploring the colonial legacy of language in India.

Art by Pranay Jha.

भारत एक ऐसा देश है जिस में २२ भाषाए, १३ लिपियाँ और ७२० बोलियाँ हैं। भाषा का हमारे इतिहास में बहुत ही जटिल स्थान रहा है ।

आज की अधिकांश युवा पीढ़ी या तो अंग्रेजी या हिंगलिश (अंग्रेजी और हिंदी का मिश्रण) का प्रयोग करती है।  भारत की इस भाषाई जटिलता के पीछे अंग्रेजों का बहुत बड़ा हाथ रहा है। अंग्रेज़ों ने भारत की भाषाओ को अनिश्चित परिस्थिति में छोड़ा था जिसके प्रभावों को हम अब तक महसूस कर सकते हैं।

अपनी मातृभूमि भारत को छोड़ने और ऑस्ट्रेलिया आने के उपरांत मेरे अंदर दबी भारतीयता और अपनी जड़ो के प्रति प्रेम भावना और भी प्रबल हो गयी है । हलाकि बचपन में मैंने अपने परिवार के साथ शायद ही कभी हिंदी में वार्तालाप की होगी। मैंने हमेशा अंग्रेजी ना की हिंदी को अपनी पहली भाषा माना है। मुंबई में मैं एक अंग्रेजी माधयम विद्यालय में पढ़तीथी जहाँ अंग्रेजी पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाता था और वहां अंग्रेजी में बात करना अनिवार्य था। मेरे लालन पालन में भी विदेशी संस्कृति का ज़्यदा प्रभाव था। मुझे भारतीय नृत्य और आलू परांठा की जगह विदेशी संगीत और बर्गर ज़्यादा पसंद था।

भारत में अंग्रेजी भाषा उच्चनिये शिक्षा तथा उच्च वर्ग का प्रतिक माना जाता है। मैं सोचती थी की इस वर्ग से सम्बंधित होने में एक खास बात थी। मैं उन लोगो में से थी जिनकी हिंदी भी अंग्रेजी की तरह सुनाई पड़ती थी। मेरे मित्र जिन की हिंदी मुझ से कही ज़्यदा मज़बूत थी अक्सर मेरी विचित्र हिंदी पे हंस पड़ते थे और मेरा मज़ाक बनाते हुए ना थकते थे। मुझे ऑस्ट्रेलिया आने के उपरान्त अपनी जड़ो की महत्त्व का ज्ञान हुआ। मुझे यह भी लगा की अगर मैं अपनी जड़ो को स्वीकार नहीं करती हूँ तो मेरी प्रगति पूर्ण रूप से कभी न हो पायेगी और कहीं न कहीं एक अधूरापन मुझ में हमेशा रहेगा।

हिंदी के प्रति अपने स्वयं के दृष्टिकोण की खोज करने में, मुझे अंग्रेजी, (जो की भारत में ब्रिटिश शासन की विरासत है) को दिए जा रहे महत्व के पीछे मूल कारण का पता चला। स्वतंत्रता प्राप्त करने के बावजूद, अंग्रेजी आज भी, ना केवल हिंदी बल्की भारत में अन्य क्षेत्रीय भाषाओं पर भी श्रेष्ठता रखती आ रही है। जो लोग अंग्रेजी ठीक से नहीं बोल पाते हैं, कही न कही आज भी हींन दृष्टि से देखे जाते हैं और निम्न वर्ग से जोड़ दिए जाते हैं – एक ऐसी छवि जिसे कुछ लोग सख्ती से मिटा देने का प्रयास कर रहे हैं।

अंग्रेजी भाषा को दिया गया महत्व भारत में सामाजिक शक्ति और स्थान के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है और इसकी जड़े ब्रिटिश राज मे हैं। मेयो कॉलेज जैसे स्कूलों ने ऐतिहासिक रूप से ब्रिटिश अंग्रेजी की नकल करने के लिए अपने छात्रों को प्रशिक्षित किया। तथ्य यह है कि प्रचार और क्रांति के डर से ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक विस्तारित अवधि के लिए वर्नाक्यूलर प्रेस को समाप्त कर दिया था। अंग्रेजी, प्रेस को जीवित रखने का एकमात्र स्रोत बन गया था।

अंग्रेजी का महत्व आज भी बरक़रार है और जो भारतीय धाराप्रवाह अंग्रेजी नहीं बोल सकते हैं, या जिन्हे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाई करने का सौभाग्य नहीं मिला है, उन्हें अक्सर नकारात्मक तरीके से आंका जाता है। अंग्रेजी भाषा आज भी उन लोगों को शक्ति प्रदान कर रही जो उस भाषा का धाराप्रवाह प्रयोग करना जानते हैं। यह भाषा आज भी आपके लिए कई महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान कर सकती है।

जहां मेरी बात आती है, तो मेरा यह मानना है की मुझे अंग्रेजी के प्रभाव के कुछ फायदे ज़रूर हुए हैं। जहाँ मैं अपनी जातीयता के कारण अपने आप को अलग महसूस करती हूँ वहीँ धाराप्रवाह अंग्रेजी भाषा बोल पाने के कारण अपने आप को ऑस्ट्रेलियन समूह में साम्मलित पाती हूँ। हालाँकि, मैं अपने आप को पूर्ण रूप से तभी समझ पायी जब मैने अपना परिचय अपनी खुद की मूल भाषाओं से करवाया और पूरी तरह से उन मूल भाषाओं के महत्व को पहचाना।

व्यक्तिगत स्तर पर, जहाँकि हिंदी सीखना ब्रिटिश शासन की विरासत का एक महत्वपूर्ण प्रतिरोध हो सकता है, यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि हिंदी का उदय क्षेत्रीय भाषाओं की कीमत पर होता है। स्कूलों में हिंदी के अनिवार्य उपयोग और संस्कृति में इसके उपयोग (जैसे बॉलीवुड) ने भारत में युवा पीढ़ी के लिए अपनी मूल क्षेत्रीय भाषा पर हिंदी को चुनना आसान बना दिया है। हमें हिंदी के प्रभुत्व के पीछे के ऐतिहासिक कारणों पर भी विचार करना चाहिए।

स्वतंत्रता सेनानियों से निपटने के लिए, ब्रिटिश अक्सर उत्तर भारत के लोगों के पक्षधर थे, जिनके लिए हिंदी उनकी मुख्य भाषा थी। इसके अतिरिक्त, ब्रिटिश और ईस्ट इंडिया कंपनी ने हिंदी भाषा को भी सीखने की कोशिश की, उस समय की भारत के शासक वर्ग के साथ काम करने के लिए। इसका मतलब यह था कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद, जो लोग शक्तिशाली थे (ब्रिटिश शासकों के साथ उनकी अनुकूल स्थिति के कारण), उनमें हिंदी के पक्ष में एक स्वाभाविक पूर्वाग्रह था।

हालांकि, हिंदी को अपनाना किसी चुनौती से कम नहीं था। क्षेत्रीय भाषाओं की स्वीकार्यता के लिए लड़ने के लिए विभिन्न राज्यों में विभिन्न सम्मेलन आयोजित किए गए। कई लोगों के लिए, क्षेत्रीय भाषाएँ सांस्कृतिक प्रभुत्व और भारत की विविधता का एक महत्वपूर्ण प्रतिबिंब थी, विशेष रूप से जहाँ तमिलनाडु के हिंदी विरोधी संघर्षों की बात आती थी।

सरकारी भाषा के रूप में हिंदी की स्थिति धर्म के संदर्भ में भी समस्याग्रस्त थी। उदाहरण के तौर पर ब्रिटिश अक्सर हिंदू और मुसलमानों के बीच विभाजन के उद्देश्य से हिंदी या उर्दू को भारत की सरकारी भाषा निर्धारित कर देती थी। इस तरह के संघर्ष काफी अनावश्यक थे। उस समय अधिकांश भारतीय या तो हिंदी या उर्दू के बजाय हिंदुस्तानी (विभिन्न भाषाओं का मिश्रण) बोल रहे थे। दोनों भाषाओँ मे वैसे भी बहुत समानता थीं।

क्षेत्रीय भाषाएँ भी काफी समस्याग्रस्त थी। उन क्षेत्रीय भाषाओं के लिए, कुछ समूहों ने अपनी तरह बोले जाने वाली भाषा के आधार पर उनकी प्रभुत्व का दावा किया। उदाहरण के तौर पर, तमिल और मैथिल ब्राह्मणों का तर्क यह था की उनकी तरह बोली जाने वाली मैथिलि या तमिल का स्तर उच्चनीय था ।

सवाल यह उठता है कि क्या वास्तव में भाषाएँ ब्रिटिश शासन के प्रतिरोध का एक रूप हैं? इसका उत्तर यह है भाषा का उपयोग प्रतिरोध के लिए किया जा सकता हैं, लेकिन हमें कुछ अन्य तरीकों पर भी विचार करना चाहिए जिनमें भाषा का उपयोग किया जाता है। हम भारत के लिए जिन भाषाओं को भी चुनते हैं, अगर भाषा वर्ग और जातिगत भेदभाव का आधार बन जाती है, तो हम बस शासकों के एक समूह की भाषा को दूसरे के साथ बदल रहें हैं। इसलिए, इस सवाल का जवाब देने से पहले कि किस भाषा को अपनाया जाना चाहिए, भारत को इस बात का समाधान खोजना चाहिए की वह वर्ग, संस्कृति और जाति के आधार पर भेदभाव और वर्चस्व को सुधारने के लिए क्या कदम उठाएगा।